चौपाल में बैसाखी के साथ जलियाँवाला बाग की याद

इस बार मुंबई चौपाल कुछ अलग ही रंग में थी। श्री अतुल तिवारी अपनी पूरी मस्ती के साथ चौपाल का संचालन किया। संचालन करने के साथ ही उन्होंने देश भर में अलग अलग तरीके से बैसाखी मनाने की परंपराओं की जानकारी देते हुए बताया कि बंगाल में इसे पैला ( पीला) बैसाख के नाम से,  दक्षिण में बिशु के नाम से केरल, तमिल और असम में बिहू के नाम से मनाया जाता है। ग्रीस में भी इसे जमीन को उर्वरकता प्रदान करने वाले देवता के आगमन के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर मछली पकड़ने के जालों की पूजा भी की जाती है।

उन्होंने एक रोचक जानकारी देते हुए बताया कि 1919 में बैसाखी 13 अप्रैल को आई थी, और इसके बाद 21 वीं शताब्दी में अंग्रेजी कैलेंडर एक दिन आगे खिसकाने की वजह से यह 14 अप्रैल को मनाई जाने लगी।

अतुलजी ने बताया कि मुंबई चौपाल की नेट पर निरंतर हो रही पोस्टिंग से जाने माने गीतकार और फिल्मकार गुलज़ार साहब इतने प्रभावित हुए कि उन्होने चौपाल में पढ़ी जाने वाली रचनाओं और रचनाकारों को लेकर एक नियमिमत बुलेटिन प्रकाशित करने के लिए अपनी ओर से दस हजार रुपये देने की पेशकश की, उनके सुझाव को अतुलजी ने सभी चौपाली बंधुओं की ओर से स्वीकार तो किया मगर राशि लेने से इंकार कर दिया। उनका कहना था गुलज़ार साहब का आशीर्वाद और मार्गदर्शन इस चौपाल की सबसे बड़ी पूंजी है।

तो चलो चौपाल की शुरुआत हुई और बैसाखी का रंग चैपाल में खूब जमा,  मगर हम इस चौपाल का पूरा हाल आपको नहीं बता पाएंगे क्योंकि थोडी देर के लिए हमें एक रेकॉर्डिंग में जाना पड़ा और चौपाल की राजधानी एक्सप्रेस अपनी गति से बगैर रुके अपनी गति से चलती रही। फिर भी जो भी हमारे कानों और आँखों के हिस्से में आया उसे आप तक पहुँचा रहे हैं।

चौपाल की शुरुआत हुई पुष्पा राव द्वारा प्रस्तुत अमीर खुसरो की कृष्ण पर लिखी रचना से।  

मुँह से बोलो ना बोल,  मेरी सुन या अल्ला सुन

मैं तो तोहे ना छोडूंगी रे सांवरे,  मौरी सास ननंदिया फिरतौ फिरे

मौसे फिरे क्यूं जाए सांवरे, मैं भी तो आई तौरी छाँव रे

रही लाज शरम की बात कहाँ, जब प्रेम के फांदे दियो पाँव रे

मौसे बोलो न बोल….

(यह बता देना उचित होगा कि सूफी पंरपरा में  भक्त अपने आपको ईश्वर की प्रेमिका समझता है, इसीलिए सूफी गीतों के रचयिता भले ही पुरुष हों वे अपने आपको स्त्री के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं)

इस बार चौपाल में खास मौजूदगी थी अनिल सहगल साहब की, उन्होने जलियाँ वाला बाग की कई मर्मांतक घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि इस कांड मे सभी जातियों के हजारों लोगों ने कुर्बानी दी थी, और आज़ादी की लड़ाई में शहीदों की शहादत के साथ ही उस दौर के साहित्यकारों का भी ज़बर्दस्त योगदान था। जंगे आज़ादी के दो नारे जो क्रांति के प्रतीक बन गए थे इंकलाब जिंदाबाद और वंदे मातरम् साहित्यकारों की ही देन थे। ये नारे  पूरे आज़ादी आंदोलन में लोगों में जोश भरते रहे। उन्होंने कहा कि जंगे आज़ादी की लड़ाई में चंद सिपाहियों के नाम ज़रुर सामने आ जाते हैं और पीढी दर पीढ़ी याद रखे जाते हैं मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हजारों लाखों शहीद ऐसे होते हैं जिनका कोई नाम नहीं होता है मगर उनकी शहादत कभी किसी से कम नहीं रही। उन्होने कहा कि उस दौर के साहित्यकार सरजू ने जलियांवाला बाग के विरोध में एक कविता लिखी थी, अंग्रेज सरकार ने उनको गिरफ्तार तो किया ही उस कविता को भी जप्त कर लिया और उसके पढ़ने और लिखने पर पाबंदी लगा दी।

पेश है इस कविता की कुछ पंक्तियाँ जिसे सुश्री सीमा सहगल ने अपनी सुरीली आवाज़ में पेश  कर पूर्  माहौल में मानो वीर रस की वर्षा कर दी।

बेगुनाहों पर बमों की बेखबर बौछार की

दे रहे हैं धमकियाँ बंदूक और तलवार की

बाग़-ए-जलियाँ में निहत्थों पर वो चलाई गोलियाँ

पेट के बल भी रंगाया जुल्म की हद पार की।

हम गरीबों पर कया जिसने सितम बेइंतहा

याद  भूलेगी नहीं उस डायरे बदकार की

शोर आलम में मचा है हाजपत के नाम से खार करना इनको चाहा अपनी मिट्टी खार के

बेगुनाहों पर बमों की बेखबर बौछार की

दे रहे हैं धमकियाँ बंदूक और तलवार की

जिस जगह पर बंद होगा शेरे नर पंजाब का

आबरु बढ़ जाएगी उस जेल की दीवार की

जेल मं भेजा हमारे लीडरों को बेकुसूर

लॉर्ड रिडींग तुमने अच्छी न्याय की भरमार की

इस कविता के साथ उन्होने एक और ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि 1919 में जलियाँवाला बाग कांड के पहले 1914 में गुजराँवाला शहर में जब आज़ादी की जंग का लावा फूटा था तब अंग्रेजों ने विमानों से लोगों पर बमों की बौछार की थी, इसीलिए इस कविता में बमों की बौछार शब्द का उल्लेख आया है। उन्होने बताया कि इसके बाद अमृतसर की गलियों में भारतीयों को पेट के बल लेटकर जाना पड़ता था, वे अपने पैरों पर चलकर कहीं आ जा नहीं सकते थे। इस बात उल्लेख अंग्रेज अफसर पी जे हॉर्निमेन ने खुद किया है।

 सुश्री सीमा सहगल ने माहौल में संगीत का रस घोलते हुए माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा पेश की।

यह कविता तो स्कूली किताबों में कई बार सुनी और रट रट कर परीक्षाएं भी पास कर ली मगर जिस भाव और तल्लीनता के साथ उन्होने यह रचना पेश की, ऐसा लगा मानो कोई गीतकार देश के बच्चे बच्चे को ललकार रहा है।

चार पंक्तियाँ पेश है

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूंथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर,

है हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के सिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक।
मैं क्षमा प्रार्थी हूँ कि चौपाल में इस प्रसंग को पढ़ने वालों को उस कविता के शब्द ही पढ़ने को मिल रहे हैं सीमाजी  ने जिस गहराई और भावप्रणणता के साथ इस कविता के शब्दों को जीवंतता प्रदान की है, वह आप तक नहीं पहुँच पा रही है, मगर मुझे उम्मीद है कि चौपाल के सुधी पाठक खुद उस भाव बोध को ग्रहण कर इन शब्दों के मर्म को पकड़ लेंगे।

गुरूवाणी के गायक कुलदीपसिंहजी ने इस मौके पर बैसाखी पर एक पंजाबी अखबार मं प्रकाशित एक आलेख को हिंदी मं पढ़कर सुनाया पढ़ा जिसमें पंजाबी मानसिकता में बैसाखी के महत्व को प्रतिपादित किया गया था।

 उन्होने बताया कि 1469 में गुरू नानक देवजी ने जिस खालसा पंथ की कल्पना की थी 1699 में गुरू गोविंद सिंहजी उसी खालसा की स्थापना की। कुलदीपसिंहजी ने अपनी दो बेटियों के साथ बैसाखी की मस्ती के कुछ गीत पेश कर पूरी चौपाल को बैसाखी के रंग में रंग दिया।

इस मौके पर प्रयोगधर्मी फिल्मकार श्री चित्रेश द्वारा निर्मित एक फिल्म भी दिखाई गई। उन्होने यह फिल्म देश के जाने अनजाने शहीदों की शहादत को याद करते हुए कई प्रामाणिक तथ्यों व घटनाओं के उल्लेख के साथ बनाई है। हम तो यह फिल्म नहीं देख पाए मगर चित्रांश जी से चौपाल पढ़ने वालों के लिए जरुर निवेदन करेंगे कि इस फिल्म के बारे मे वे  बताएं।

कार्यक्रम का समापन अतुलजी ने इन शब्दों के साथ किया

 कितने भी जलियाँवाला बाग आए,

उम्मीदें नहीं छोड़नी है

बैसाखी यही एक उम्मीद जगाती है

 चौपाल के आठ साल और इप्टा के 65 साल एक साथ

उम्मीद जगाने के इसी सिलसिले के साथ आपको यह भी बता दिया जाए कि अगली चौपाल रविवार, 13 मई को अपरान्ह 4 बजे  मुंबई में ही होगी और इस बार चौपाल पना आठवाँ साल मना रही है साथ ही इप्टा के 65 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में चौपाल में इप्टा की इस 65 साल की यात्रा पर चर्चा होगी। इस मौके पर इप्टा, फिल्म, थिएटर, कला और साहित्य से जुड़ी कई शख्सियतें चौपाल में मौजूद होंगी। यानि अगर फिल्म की भाषा में कहा जाए तो इस बार चौपाल की मल्टी स्टारर फिल्म रीलिज होने जा रही है। आप अगर चौपाल में आना चाहें तो हमें मेल भेज दीजिए आपको पूरा पता आदि भेज दिया जाएगा।  

4 Responses to चौपाल में बैसाखी के साथ जलियाँवाला बाग की याद

  1. माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा अशुद्ध है कृपया इसे ठीक कर दीजिए …….. शुद्ध रूप में इस कविता को आप कविता कोश http://www.kavitakosh.org पर देख सकते हैं।
    डॉ॰ जगदीश व्योम

  2. चाह नहीं मैं सुरबाला के
    गहनों में गूंथा जाऊँ,
    चाह नहीं प्रेमी-माला में
    बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
    चाह नहीं, सम्राटों के शव
    पर, है हरि, डाला जाऊँ
    चाह नहीं, देवों के शिर पर,
    चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!
    मुझे तोड़ लेना वनमाली!
    उस पथ पर देना तुम फेंक,
    मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
    जिस पथ जावें वीर अनेक।
    —पं० माखनलाल चतुर्वेदी

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