चौपाल में 1857 के 150 साल पूरे होने पर सार्थक चर्चा
लगता तो ऐसा है कि न तो देश की सरकार को न नेताओं को और न ही मीडिया माध्यमों को इस देश के गौरवशाली इतिहास से कोई लेना देना नहीं है। मीडिया तो अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान से लेकर लालू प्रसाद यादव के घेरे से बाहर आ ही नहीं पाता है। ऐसे में उन्हें कहाँ याद रहे कि देश की आज़ादी की लडाई का शंखनाद करने वाली 1857 की क्रांति का यह 150 वाँ साल है…खैर, इस बात को और किसी ने याद रखा हो या न हो मुंबई के जागरुक हिंदी प्रेमियों की चौपाल ने इस पूरे साल अपनी चर्चा का विषय ही 1857 की क्रांति को बनाया है। इस गौरवशाली विषय चयन के लिए पटकथा लेखक श्री अतुल तिवारी निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं।
जाने माने अभिनेता श्री राजेंद्र गुप्ता के घर संपन्न हुई इस बार की चौपाल में 1857 पर बेहद सार्थक और विचारोत्तेजक चर्चा की शुरुआत हुई। 1857 की क्रांति के इतिहास पर शोध कर रहे पत्रकार और टाईम्स ऑफ इंडिया व इकॉनॉमिक टाईम्स के स्तंभकार श्री अमरेश मिश्रा ने अपनी बोधगम्य और शोधपरक चर्चा मे इस क्रांति से जुड़े कई अनजाने तथ्यों का खुलासा किया।
श्री अतुल तिवारी ने अपनी जोशीली रचना से इस कार्यक्रम की शुरुआत की।
सुनो सुनो सुनाएं कहानी
आज सुनानी है जो कहानी
वैसे कहते हैं है ये बड़ी पुरानी
दादा के दादा और नानी की नानी
ऐसी हमने सुनी ये कहानी
बीती सदी और बरस पचासा
जब ये हुआ गजब तमाशा
उसी विप्लव, उसी क्रांति की
एक आरंभ और युगांत की
सुनो कहानी, सुनो कहानी
श्री अमरेश मिश्रा ने अपनी चर्चा जारी रखते हुए यह तथ्य प्रतिपादित किया कि किस तरह इस क्रांति ने देश भर में आग पकड़ ली, जबकि तब कोई समाचार माध्यम तक नहीं था। उन्होंने कहा कि यह क्रांति देश की जनता की सहज स्फूर्त प्रतिक्रिया थी, जो अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ एक शोले की तरह भड़की। उन्होंने कहा कि इस क्रांति की सबसे बड़ी ताकत और खास बात यह थी कि हिंदू और मुसलमान दोनों ने ही मिलकर इस लड़ाई को अपने अंजाम तक पहुँचाया, इसमें दलित, पिछड़े और समाज के उपेक्षित कहे जाने वाले वर्ग ने भी पूरी सक्रियता से भागीदारी की।
श्री मिश्रा ने कहा कि भारत सरकार 1857 की क्रांति की 150 वीं सालगिरह को जोर शोर से मनाने की तैयारी कर रही थी (श्री मिश्रा सरकार द्वारा इस हेतु बनाई गई समिति के सदस्य थे) लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते इसे बजाय 1857 की क्रांति के रूप में मनाने के 1857 से आज तक के भारत की स्थिति के रूप में मनाया जा रहा है। इस बात को स्पष्ट करते हुए उन्होने कहा कि अंतर्रष्ट्रीय शक्तियाँ कतई नहीं चाहती कि 1857 की जिस क्रांति ने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोकर विदेशी साम्राज्य की जड़ें हिला दी थी वे स्थितियाँ देश के लोगों को याद दिलाई जाए। श्री मिश्रा ने अपने कई वर्षों के शोध और परिश्रम से 1857 की क्रांति पर अंग्रेजी में एक पुस्तक भी लिखी है जो शीघ्र बाज़ार में आने वाली है। उन्होंने कहा कि 1857 की क्रांति में भारत का भविष्य छुपा है।
उन्होंने दुःख व्यक्त करते हुआ कहा कि 1857 की क्रांति की याद गाँवों में तो आज भी जिंदा है मगर शहरी लोग इसे भूल चुके हैं। आज भी देश के हालात 1857 की क्रांति से पहले जैसे होते जा रहे हैं। श्री मिश्रा ने अपने शोध के आधार पर क्रांति से जुड़ी कई छोटी छोटी घटनाओं का बेहद रोमांचक और विचारोत्तेजित करने वाला विश्लेषण प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर कॉर्पोरेट जगत से जुड़े और आर्थिक विषयों पर ज़बर्दस्त पकड़ रखने वाले श्री सचिन जुनेजा ने इस क्रांति के आर्थिक पहलुओं को एक नए आयाम के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि यह क्रांति इस बात का सबूत थी कि जनता खुद अपने दम पर अपने पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से उस समय देश में ऐसा कोई नेता नहीं था जो इस क्रांति की मशाल को आगे बढ़ाता, अगर इस क्रांति को एक अच्छा दूरदर्शी नेतृत्व मिलता तो इसका प्रभाव ज्यादा और व्यापक हो सकता था। श्री जुनेजा ने क्रांति से जुड़े आर्थिक पहलुओं की चरचा करते हुए उस समय के समाज की आर्थिक स्थिति पर रोचक जानकारियाँ प्रस्तुत की।
श्री अमरेश मिश्रा ने बताया कि 1857 में भारत की आबादी 15 करोड़ थी और इस क्रांति में 1 करोड़ लोग मारे गए थे। जबकि द्वितीय विश्व युध्द में इससे आधे ही लोग मारे गए थे। उन्होंने कहा कि अवध की आबादी उस समय 1 करोड़ थी और वहाँ पर 30 लाख लोग मारे गए। यह बात गौर करने लायक है कि 1857 में देश की जो आबादी थी वह 1900 में एक तिहाई रह गई थी।
कार्यक्रम में गुजराती और हिंदी के प्रसिध्द भजन गायक श्री असीत देसाई और श्रीमती हेम देसाई ने गाँधीजी के प्रिय भजन प्रस्तुत किए।
एकल अभिनय के माध्यम से स्वामी विवनकानंद, तुलसीदास और कबीर जैसी विभूतियों के जीवन चरित्र को देश और दुनिया भर में प्रस्तुत कर अपनी अलग पहचान बनाने वाले गायक संगीतकार और अभिनेता श्री शेखर सेन ने हिंदी और गुजराती में राष्ट्र भक्ति गीत प्रस्तुत कर कार्यक्रम का समापन किया।
श्री अतुल तिवारी ने बताया कि चौपाल के हर सत्र में 1857 की क्रांति से जुड़े विविध पक्षों पर साल भर निरंतर चर्चा होती रहेगी।
March 1, 2007 at 13:12 p03
साधू-साधू
उस व्यक्ति को भी याद कर लेना जिसने इस विप्लव को भारत की प्रथम आजादी की लड़ाई कहा तथा इसका इतिहास भी लिखा.
आजादी का इतिहास गाँधी से परे भी है.
March 1, 2007 at 13:12 p03
१८५७ की १५०वीं जयन्ती के अवसर पर साल भेर कार्यक्रम लेने के विचार पर हार्दिक शुभकामना,साधुवाद।हमारे छोटे से समूह ने निर्णय लिया है आज़ादी की पहली लड़ाई की याद में एक पुस्तिका निकाली जाए।बहादुरशाह ज़फ़र पर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का एक सुन्दर भाषण ‘निरंतर’ के अगले अंक में आने की उम्मीद है ।
March 1, 2007 at 13:12 p03
बहुत अच्छे.
अब अगली बार से तो इस चौपाल में हम भी होंगे आपका साथ देने को.
March 1, 2007 at 13:12 p03
बहुत अच्छी पहल है। बहुत सारी शुभकामनायें !
March 1, 2007 at 13:12 p03
1857 की क्रांति के 150 वाँ साल को याद रखने और उसकी अलख जगाए रखने के लिए आप सब का मेरा अभिनन्दन ।
March 1, 2007 at 13:12 p03
अंतर्रष्ट्रीय शक्तियाँ कतई नहीं चाहती कि 1857 की जिस क्रांति ने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोकर विदेशी साम्राज्य की जड़ें हिला दी थी वे स्थितियाँ देश के लोगों को याद दिलाई जाए।
koi baat nahi hum sab milke to aisa kar sakte hain ki sabko yaad dila den, sadhu vaad iski shuruaat ka bigul bajane ka.
March 1, 2007 at 13:12 p03
बहुत बहुत बधाई सब को इस शुभ मौके पर। यही वक्त है उन शहीदों को याद करने का जिन्होंने इस पुनर्जागरण की नींव रखी।
March 2, 2007 at 13:12 p03
इसपर मैं अवश्य चर्चा करना चाहूँगा…पहले मैं यह बता दूँ कि यह विप्लव क्रांति नहीं थी एक विद्रोह जो अब प्रमाणित हो चुका है और 1 करोड़ जनता इसमें नहीं मरी थी क्यों इतनी अतिश्योक्तिपूर्ण बाते कही जा रही है मात्र इस कारण कि इसके 150 वर्ष पूरे हो गये हैं!!
मैं अवस्य पोस्ट लिखुंगा…!!
March 5, 2007 at 13:12 p03
आप लोग ही तो हैं इस मुम्बई शहर में जो पूरे देश की इतनी चिंता करते हैं. वरना लोग तो बस् ये कहते हैं कि मुम्बई खाये पिये अघाये लोगों का शहर है जहाँ लोग अगर दिमाग से सोंचते भी है तो सिर्फ देह के बारे में. वाकई, अतुल तिवारी, शेखर सेन , राजेन्द्र गुप्ता और सारे भाई साधुवाद के पात्र है.