मुंबई की चॉपाल ने एक बार फिर अपनी सार्थकता सिध्द की है। इस बार चौपाल में मुंबई के ख्यातिनाम अस्पतालों के डॉक्टरों ने अपनी विलक्षण काव्य, लेखन और गायन प्रतिभा से मौजूद चौपालियों को रोमांचित कर दिया। इस बार चौपाल पर मुंबई के जाने माने डॉक्टरों का कब्जा रहा और उन्होंने पूरी उर्जा और मस्ती के साथ मौजूद श्रोताओं को श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य, करुण और वीर रस के साथ ही शास्त्रीय गायन के माध्यम से रसों से सराबोर कर दिया। पूरा माहौल इतना अनौपचारिक और आत्मीय हो गया था कि चौपाल का नाम सार्थक हो गया। डॉक्टरों को इस मंच पर लाने का पूरा श्रेय श्री अशोक बिंदलजी को जाता है जो परदे के पीछे रहकर किसी कर्मयोगी की तरह चौपाल को सजाने में जुटे रहते हैं।
श्री अतुल तिवारी का अपना अंदाज है और वे हर बार अपने नए तेवर के साथ चौपाल का संचालन कर इसकी रंजकता को बनाए रखते है।
कार्यक्रम की शुरुआत श्री यज्ञ शर्मा द्वारा प्रस्तुत व्यंग्य रचनाओं से हुई। इसके बाद मोर्चा सम्हाला डॉक्टरों ने। डॉ. दिलीप नाडकर्णी ने ने अपना मोबाईल चोरी होने के बारे में जब अपने दोस्तों को बताया तो उनके दोस्तों ने फैज़ अहमद फैज़ की शैली में उनके ही अंदाज़े बयाँ के साथ उनके दर्द को कुछ इस तह समझा
हंगामा है क्यूँ बरपा, एक छोटी सी तो चोरी है….
फिर उन्होने अपने गम को इस तरह भुलाने की कोशिश की..
चुपके चुपके जेब से मोवाईल गँवाना याद है…
हमको अब तक वो समोसा खाना याद है…
इसके बाद डॉ. चेतन महाजन ने मराठी में अपनी शानदार व्यंग्य रचना प्रस्तुत कर इस बातो सिध्द किया कि डॉक्टर की गंभीर दिनचर्या में भी किस तरह व्यंग्य पैदा होता है।
इसके बाद समाज सेवा से जुड़ी डॉ. चेतन महाजन ने सावित्री और सत्यवान नामक रचना प्रस्तुत कर पति, पत्नी और वो से उत्पन्न सामाजिक विडंबना को बहुत ही गंभीरता से प्रस्तुत कर अपनी संवेदनशीलता से पूरे माहौल को गंभीरता से भर दिया।
डॉ. वालावणकर ने अपने डॉक्टर समुदाय पर ही किए गए छोटे छोटे व्यंग्य तीरों से पूरे माहौल में हँसी के फव्वारे छोड़े। एक नामी अस्पताल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस अस्पताल में कोई भी मरीज आता तो मर्सीडिज़ से है मगर जाता पैदल है।
डॉक्टर मिसेस माथुर ने डॉक्टरी पेशे के दौरान पैदा होने वाली अपनी छोटी छोटी रचनाओं को बेहद रोचक अंदाज़ में प्रस्तुत किया।
चौपाल में शास्त्रीय संगीत का रस घोलकर डॉ. राहुल जोशी ने तो जैसे पूरे सदन की वाहवाही लूट ली। उन्होंने किसी परिपक्व शास्त्रीय गायक की तरह एक ही बंदिश को अलग अलग रागों में गाकर मौजूद सभी श्रोताओं को अभिभूत सा कर दिया। यह जान लेना दिलचस्प होगा कि कोई सिध्दहस्त गायक भी एक ही बंदिश को अलग अलग रागों में एक साथ नहीं गा सकता।
तोरी मैं ना मानूंगी झूठी बतिया करत
सौतन के घर जावत प्रीत तोरी झूठी मैं ना मानूंगी
चलो हटो तुम उन्हीं के संगार हो
हमसे ना बोलो तुम मैने जानी बात सारी
जियरा जलत, तोरी मैं ना मानूंगी…
इस बंदिश को डॉ. जोशी ने जब राग यमन से शुर कर जौनपुरी, प्रिया घनश्री, और मालकौंस में किसी सधे हुए गायक की तरह गाया तो श्रोताओं के मुँह से लगातार वाह वाह निकलती रही। डॉ. जोशी ने कहा कि शास्त्रीय संगीत उन्हें अपने मरीज के साथ तादात्म्य बिठाने में बहुत मदद करता है। संगीत के माध्यम से डॉक्टर और मरीज के बीच सुर और ताल बैठ जाती है। साथ ही संगीत हमे हमेशा इस बात की याद दिलाता है कि हम सुरीलें बनें। डॉ. जोशी ने पंडित नारायण राव गोड़ेजी से शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ली है।
कार्यक्रम में डॉ. मानिंद पुर्वे ने रस्सी का जादू पेश कर सभी को अचंभित कर दिया। उन्होंने एक रस्सी को बार बार काटकर उसको दोबारा जोड़कर जिस अंदाज़ से पेश किया वह वाकई एक रोमांचक दृश्य था। किसी डॉक्टर को जादू पेश करते देखना सभी के लिए हैरतअंगेज अनुभव था।
डॉ. सुजाता उदेशी ने अपनी यह रचना पेश की
जब मैने खुदा से उसका पता मांगा तो उसने मेरा ही पता दे दिया
और कहा खुदा खुद में न होगा तो कहाँ होगा
जब मैने खुदा से खजाना मांगा तो उसने खुद लुट जाने को कहा
मैं लुटती गई और वह खजाना भरता गया
और जब खुदा से कुछ भी ना मांगा तो उसने मुझे सारी खुदाई देदी..
डॉ. यदुनाथ ने अपनी बरसों की एलोपैथिक प्रेक्टिस और इसके बाद होम्योपैथी के माध्यम से मरीजों का ईलाज शुरु करने के बारे में अपने अनुभवों को पेश करते हुए पूरे डॉक्टर समुदाय से कहा कि मरीज का ईलाज करने से पहले उसकी संवेदना को उसकी निजी परेशानियों को और उसके पारिवारिक व सामाजिक परिवेश को भी समझना जरुरी है। उन्होंने कहा कि ईलाज में दवाई से ज्यादा महत्व मरीज की भावनाओं को समझने और उसे राहत देने का है। उन्होंने अपने यहाँ आए कई ऐसे मरीजों के किस्से बताए जो ऐलोपैथी से ठीक नहीं हो पा रहे थे मगर होम्योपैथी से मामूली दवाओं से ठीक हो गए।
जाने माने चिंतक व साहित्यकार शीतल जैन ने अपनी धारदार रचना दंगो की पैदाईश हूँ और अहमदाबाद – फैजाबाद से सभीको झकझोर दिया।
खूब किया बापू सबको आज़ाद
तेरा बापू धन्यवाद
पर उठी टीस, घर के टुकड़े दो हुए
कुछ ढल गए कुछ जल गए
बच्चे औरत काटे गए
जबान गबरू मारे गए
हिंदु मुसलमानों के दंगो की पैदाईश हूँ
जो कभी न पूरी हो सके वो ख्वाहिश हूँ
होली के रंगों को शीतल जैन ने कुछ इस तर विखेरा
अहमदाबाद फैजाबाद
आखिर यह हे क्या
जो थे आबाद हो गए बरबाद
जो जिंदा हैं वो मुर्दाबाद
जो मुर्दा हैं वो जिंदाबाद
डॉ. अरविंद देशमुख ने अंग्रेजी रचना द फोर्थ क्लाउड प्रस्तुत की।
सुश्री मीनू जैन ने चौपाल पर अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए गाँव की चौपाल और शहर की भागमभाग की जिंदगी का बहुत ही सुंदर रुपक प्रस्तुत किया।
चौपाल के लिए खास तौर पर भुसावल से आए श्री गुरुमुख कृष्णानी ने भी अपनी रचना प्रस्तुत की। श्री रामप्रकाशजी ने घनादी छंद में राधा और कृष्ण की होली पर बहुत सुंदर रचना पेश की।
डॉ. साहिर वाला ने पर्यावरण के प्रति की जा रही अनदेखी पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि मात्र दिखावे के लिए हम जिस तरह फूलों के गुलदस्तों का उपयोग करते हैं वल बंद कर देना चाहिए, उन्होंने कहा कि फूलों की खेती के चक्कर मे सब्जियों की खेती नहीं की जा रही है और सब्जियाँ आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही है।
चौपाल हो और सबके प्रिय शेखरदा (शेखर सेन) कुछ न सुनाएँ तो पूरी चौपाल सूनी सूनी सी लगने लगती है। इस बार शेखरजी ने एक पाकिस्तानी शायरा साहबा अख्तर की कृष्ण पर लिखी गई रचना पेश की।
बाँसुरी हाथ में पकड़े सबने मुंह पर छिड़का नीला रंग
सभी कृष्ण बने तो राधा नाचे किसके संग
अंतर्यामी के दर्शन को अंतर्ज्ञानी जाए
साहबजी वनवास करके कोई राम नहीं बन पाए
उन्होंने कहा कि 1947 से 1973 तक भारतीय और पाकिस्तानी रचनाकार एक दूसरे से जुड़े हुए थे और अपनी रचनाओं का आदान-प्रदान करते थे।
इसके बाद उन्होंने अपने एकाकी नाटक कबीर से कबीर की लोई से शादी होने के प्रसंग को जिस जीवंतता से प्रस्तुत किया उससे ऐसा लगा मानो पूरी चौपाल कबीर की शादी में पहुँच गई।
चौपाल का समापन शेखरदा द्वारा प्रस्तुत ललित किशोरी जी द्वारा रचित 150 साल पुरानी रचना से हुआ और इस रचना को सुनना अपने आप मे एक अलग ही अनुभव था।
कृष्ण की आँखों का उन्होंने कितना कल्पनातीत वर्णन किया है-
लजीले, सकुटिले, सरसिले, सुरिसलेसे कुटीले से चटकीले, मटकीले हैं
रूप के लुभिले, कजरिले, उन्मिले, वरछिले, तरछिले, फसीले, गसीले से हैं
झमकीले, गरबीले मानो अति रसीले मचकीले और रंगीले हैं…
लजीले नैना नंदलाल के सजीले से हैं
क्या आज कोई रचनाकार इस बात का दावा कर सकता है कि उसकी रचना आने वाले सौ सालों में याद की जाएगी। फिल्मी गीतों की सस्ती धुनों पर लोगों को नचाने वालों को कम से कम सौ पचास बरस पहले की रचनाओं को जरुर पढ़ लेना चाहिए ताकि व यह जान सकें कि किसी के लिखी पंक्तियाँ अमर होने का माद्दा क्यों रखती है?
Posted by chaupali