नए साल की पहली गुलज़ार चौपाल

January 16, 2007

गुलज़ार रही मुंबई की साल की पहली चौपाल  नए साल की पहली चौपाल गीत, संगीत, शेरो-शायरी, कविता और गुलज़ार से गुलज़ार रही। जाने माने पटकथा लेखक श्री अतुल तिवारी ने शेरो शायरी के साथ संचालन का दायित्व निभाते हुए चौपाल में मौजूद कवियों और शायरों का एक खास अंदाज़ में परिचय देते हुए आमंत्रित किया।  कार्यक्रम की शुरुआत श्री बदन चौहान द्वारा प्रस्तुत गज़लों से हुई। लोक और नाद गायकी के सिध्दहस्त कलाकर श्री बदन चौहान को सुनना वाकई एक रोमांचक अनुभव था, यह चौपाल जैसे मंच पर ही हो सकता है कि कोई ऐसा होनहार कलाकार अपनी मस्ती और फक्कड़पन के साथ रचना पेश करे। श्री बदन चौहान ने कैसूर ज़ाफरी की इस रचन पर ज़बर्दस्त दाद बटोरी। उन्होने इन पंक्तियों से शुरुआत की…. बहर-ए-हस्ती ने हमें पार उतरने ना दियाहम तो मरते थे मगर आपने मरने ना दियाएक सज़दा भी दरे आर पे करने ना दियामरना चाहा भी तो हालात ने मरने ना दियामेरे मरने पर भी जालिम की अदावत ना गई मुकर जाने का जालिम ने अनोखा ढंग निकाला हैसभी से पूछता है, इसको किसने मार डाला हैमेरे मरने पर भी जालिम की अदावत ना गई अपने कूचे से जनाजा भी गुजरने ना दियाअजी हम तो मरते थे, मगर आपने मरने ना दियाबहर-ए-हस्ती ने हमें पार उतरने ना दिया  और अपनी बात खत्म करते हुए इस शेर पर ज़बर्दस्त दाद बटोरीशेर गोई मेरी फितरत है मगर, ऐ कैसरइस गरीबी ने मेरे फन को निखरने ना दिया  इसके बाद गज़लकार लक्ष्मण दुबे ने अपनी शुरुआत कुछ यों की…भले शौक से मयकदा तुम्हारी मगर प्यास हमारी रहेगी  मै तुम्हें उम्र भर खत न लिख सकाआस थी जब भी लिखूं, हाल अच्छा लिखूं इसके बाद उन्होंने वर्तमान हालात पर सुंदर दोहे पेश किएमजहब की चक्की चली, चूर चूर इंसानदीमक के आगे भला, क्या गीता क्या कुरान  भूलकर मत छीनना कभी किसी से आसहो सकता है हो वही दौलत उसके पास बाँट रहा मासूमियत बच्चों में नादानसीखा रहा है तैरना, मछली को नादान  स्थापित गज़लकार श्री हस्तीमल हस्ती ने अपनी शायरी का रंग दिखाया लोग मिलते ही नहीं, राह दिखाने वालेहर जगह जाल है, जाल बिछाने वाले  दर्द की कोई दवा लेकर सफर पर निकलो जाने मिल जाए कहीं, ज़ख्म लगाने वाले मुंबई बम ब्लॉस्ट की घटना और मुंबई के लोगों की जिंदादिली को उन्होने कुछ इस तरह बयां किया  तेरी साजिश में कुछ कमी है अभीमेरी बस्ती में रोशनी है अभी समाज में बदलते रिश्तों की कसक को हस्तीजी ने इस रचना से बयां कियाअब है फज़ूल वक्त कहाँ आदमी के पासदर और कोई ढूँढ ज़ज्बात के लिए  ऐसा नहीं कि साथ निभाते नहीं लोगआवाज़ दे के देखिए फसादाद के लिए इल्जाम न दीजिए किसी एक कोमुज़रिम सभी हैं हालात के लिए   शायर ताज़दार ताज़ ने अपनी बात कुछ इस तरह कही कश्ती की गरकाबी तक है दरिया का सब हंगामामौजें कब तक शोर करेगी, होगी हलचल कितनी देर  जा रे सावन तुझसे अपनी प्यास का सौदा कौन करेप्यास है जीवन भरकी, साथी तेरे बादल कितनी देर हँसते हँसते वो तो सबसे हाथ मिलाकर चला गयावो क्या जाने रोया होगा कोई पागल कितनी देर  उसने मेरा हाल सुना तो भीगा आंचल कितनी देर सारे जग से आँख बचाकर जब भी उसको सोचा ताज़मेरे सूने मन में गूँजी उसकी पायल कितनी देर   देश की जानी मानी कवयित्री श्रीमती माया गोविंद ने  राधा और कृष्ण को प्रतीक बनाकर अपनी रचना कुछ यों पेश की -  जितना तन्हा तेरा चाँद, उतना तन्हा मेरा चाँदतेरी नज़रों की चौखट पे, सहमा टूटा मेरा चाँदजंगल के सूखे पत्तों पर शबनम है, या रोया मेरा चाँदझील के ठहरे पानी में ही, मैने गहरा बोया चाँदनैनों का वीरान शहर था, जिसमें खोया मेरा चाँदकितनी है शफकार चाँदनी, अर्श से मैने धोया चाँदख्वाबों में राधा से जब पूछा,  देखा मेरा गोरा चाँदराधा बोली - चाँद और गोरा, मैने देखा काला चाँदतेरी आँखों के अंबर से टूटा, तारा-तारा चाँदतेरी आँखों के अंबर से टूटा, तारा-तारा चाँदमेरे कमरों की खिड़की पर आकर सोया चाँद घटता जाता है पल पल, सबने खूब निचोड़ा चाँदमैने पैबंद लगा लगाकर ओढ़ लिया है पूरा चाँद इसके बाद उन्होंने अपनी इस रचना से मकर सक्रांति की ठंड में रुमानी ज़ज्बातों की उष्मा भर दी-मैने जब आँखिन में डारा आज कजरा तो वारी काली घटा घबराय के चली गईजैसे घुघराली मैने अलकें सवाँरीएक नागिन ने देखा, बल खाय के चली गई मैने अंगड़ाई ली तो पड़ोस की कँवारी छोरी दाँतन में अंगुरी दबाय के चली गईरुप की चमक ऐसी कि सौतन अंगीठी सुलगाय के चली गईकहने को तो साल बीता मगर वह रात मीठी सजना को छुड़ाय के चली गईमैं तो बूंद विरही हूँ, पुरवा की जोड़ी मोहे गरम तवे पर बूंद सी छनकाय चली गईचाँदनी की बिटिया किरन आई खिड़की से दूध जैसी चादर बिछाय के चली गई   जाने माने गीतकार, निर्देशक और लेखक गुलज़ार ने मुंबई की इस चौपाल को निरंतर सीखने और प्रेरणा मिलते रहने का एक मंच बताते हुए बचपन की जिंदगी को लेकर एक मार्मिक रचना प्रस्तुत की।   भीग जाता था जब बादल भीग जाती थी किताबजब शोर करते ऎथे परिंदे मेरे बस्ते में सब टीचर भी मेरे नाराज़ होते थे किताबें बड़ी होती गई सारी, वजन बढ़ता गया उनकामेरा बस्ता पुराना हो रहा था, फट रहा था  इसके बाद उन्होने महानगरीय ज़िंदगी के कटु यथार्थ को इस दर्द के साथ अभिव्यक्त किया-मै नीचे चलकर रहता हूँ जमीं के पास ही रहने दो मुझको बहुत ही तंग है ये सीढ़ियाँ ग्यारहवीं मंजिल कीदबाव पानी का भी छठी मंजिल तक आता हैमेरी मौत के बाद तुम मुझे सीढ़ियों से दोहरा करके उतारोगे उन्होंने परिवार की विषमताओं को कुछ इस तरह बयाँ -किया- मकाँ की ऊपरी मंजिल पर अब कोई नहीं रहतावो कमरे बंद हैं कबसे वो चौबीस सीढि़याँ उन तक पहुँचती थीवहाँ उन कमरों में याद है मुझको खिलौने एक पुरानी टोकरी में रखे थेवहाँ एक बालकनी थी जहाँ मेरा दोस्त तोता, जिसे मैं हरी मिर्ची खिलाता था, आता था मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं वो निचली मंजिल पर रहते थेजहाँ एक पुराना पियानो रखा हैमगर वह कुछ बेसुरी आवाज करता हैसुरों पर इसके सुर चढ़ गए हैं  इसी मंजिल पे पुश्तैनी बैठक थीजहाँ पुरखों की तस्पीरें टंगी थीहवाएं आकर उनको टेढ़ी कर जाती थीमैं सीधा करता रहता थाबहू को उन तस्वीरों की बड़ी बड़ी मूँछे पसंद नहीं थीमेरे बच्चों ने उन तस्वीरों को उतारा और पुराने पेपर में महफूज़ करके रख दियामेरा एक भांजा ले जाता है उन्हें किराये से देता है फिल्मों की शूटिंग पर सेट बनाने के लिए कार्यक्रम का संचालन करते हुए श्री अतुल तिवारी ने गुलज़ार साहब का परिचय यों दियाहाल गुलज़ारे ज़माना है कि रंग ए शफकरंग कुछ और हो जाता है इस हाल के बाद   चौपाल की खासियत यह है कि इसमें भाग लेने के लिए जाने माने हास्य कवि श्री घनश्याम अग्रवाल मुंबई से 600 किलोमीटर दूर अकोला से आए, उन्होंने एक टूटे पूल की वेदना को इस तरह बयाँ किया लोहे का बड़ा हिस्सा इंजीनियर, ठेकेदार और मंत्री ने खा लियाबेचारा पुल यह सब जानता था  दिन लोगों के तानों से तंग आकर उसने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली रेल के लंबे सफर में रेलगाड़ी किस प्रदेश से गुज़ रही है उसकी बानगी उन्होंने अपने व्यंग्य से इस तरह से पेश की  जब आप किसी स्टेशन पर उतरें और वापस अपनी सीट पर जाएं औरआपकी सीट पर कोई दूसरा बैठ जाए और आपको देखकर वापस उठ जाए तो समझो महाराष्ट्र आ गया हैऔर अगर कोई थोड़ी जगह बनाकर बैठ जाए तो समझो मध्यप्रदेश आ गया हैऔर अगर कोई आपकी आधी सीट पर कब्जा कर ले तो समझो उत्तरप्रदेश आ गया हैऔर आपको आपकी सीट पर से उठाकर कोई दूसरा बैठ जाए तो समझो कि बिहार आ गया है चौपाल की सबसे सशक्त स्तंभ सुश्री पुष्पा भारती (स्व. धर्मवीर भारती की पत्नी) ने स्वर्गीय भारतीजी की गणतंत्र पर लिखी गई एक रचान का पाठ किया। भारती जी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि भारती जी को हर साल गणतंत्र दिवस पर लालकिले पर होने वाले कवि सम्मेलन में बुलाया जाता था मगर वे हमेशा ही वहाँ जाना टालते रलते थे। लेकिन एक बार वे इसी शर्त पर गए कि वे अपनी पसंद की रचना ही सुनाएंगे।   स्व. भारती जी ने 26 जनवरी, 1968 को इस रचना का पाट लाल किले पर किया था हजार सद हजार बार नाम की इस कविता में स्व. भारतीजी ने गणतंत्र कि विडंबना को बहुत ही सशक्त शब्दों में व्यक्त किया था।   बानगी देखिए इसमें चंद शब्द हैं श्रीमान जो मेरे पिता के पिता के पिता के पिता के पिता ने कहे थे.. इसके बाद अभिनेत्री और कवयित्री दीप्ती मिश्र ने जो दम भरते हौ चाहत का तो, जरा निभाओ तो के माध्यम से रिश्तों की खटास और मिठास को पेश किया।  श्री यज्ञ शर्मा ने कोई पेट से बड़ा नहीं होता शीर्षक से अपनी रचना प्रस्तुत की-हर विचार को आँतों से गुज़रना होता हैगाँधी हो या हिटलर भगवान हो या शैतानसब अपना नाम जपने वालों के साथ रहते हैंअंत सबका वही होता है  आँतों से गुज़रने पर किसी का होता है इस अवसर पर श्री विजय कुमार, श्री आलोक श्रीवास्तव, श्रीशमी मुस्तसर, श्री सोहन शर्मा, श्री नामवर आदि ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।   कार्यक्रम का समापन हर बार की तरह श्री शेखर सेन ने किया, और यह रचना पेश की-बिना दवा के मर जाते हैं यहाँ पे जच्चा बच्चाऔर रेडिओ चीख रहा है सारे जहाँ से अच्छा….पहली बारिश में टूटा था बाँध, जो बना था कच्चाऔर रेडिओ चीख रहा है सारे जहाँ से अच्छा….जाँच कमीशन बैठी रहती है, खूनी देता गच्चाऔर रेडिओ चीख रहा है सारे जहाँ से अच्छा….बचपन बीता मजबूरी में, बूढ़ा हो गया बच्चाऔर रेडिओ चीख रहा है सारे जहाँ से अच्छा…. 

      


चौपाल मुंबई की

January 13, 2007

  मुंबई एक ऐसा शहर जहाँ किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि पल दो पल पने लिए भी वक्त निकालें, मगर इसी शहर में कई ऐसे लोग और संगठन हैं जो अपने लिए ही नहीं बल्कि  दूसरों के लिए भी वक्त ही नहीं निकालते बल्कि कुछ अलग करना चाहते हैं।  मुंबई चौपाल भी एक ऐसा ही संगठन है जिससे जुड़े समर्पित हिंदी प्रेमियों ने हिंदी भाषियों को रचनात्मक उर्जा देने का अनवरत सिलसिला सा शुरु किया है। इस चौपाल में आकर एक आत्मीय सुकून मिलता है।   अपने एकांकी नाटकों के माध्यम से देश और दुनिया में कबीर, तुलसी और विवेकानंद जैसे महापुरूषों के चरित्रों को सजीवता से पेश करने वाले शेखर से हों, जाने माने पटकथा लेखक अतुल तिवारी या फिर अपना कारोबार छोड़कर हिदी की चिंता करने वाले अशोक बिंदल, सभी पूरे प्रण-प्राण से इस चौपाल को एक सशक्त मंच बनाने में जुटे रहते हैं। यही वजह है कि मुंबई शहर में चौपाल का सिलसिला विगत आठ वर्षों से लगातार चल रहा है। इस संस्था की खासियत यह है कि इसमें कोई पदाधिकारी नहीं है, सभी एक साथ एक ही जगह पर बैठकर आपस में साहित्य, फिल्म, कला और संस्कृति के विविध प्रक्षों पर खुलकर चर्चा करते हैं। यहाँ प्रेंमचंद पर भी बात होती है तो चार्ली चैप्लिन पर भी।  पारिवारिक और आत्मीय वातावरण में तीन से चार घंटे कब निकल जाते हैं पता ही नहीं चलता है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ नई पीढ़ी के लोग बुज़ुर्गों के साथ बैठकर एक साथ बात करते हैं। चौपाल की खासियत यह है कि यहाँ परदे पर काम करने वाले भी आते हैं तो परदे के पीछे रहकर किसी अभिनेता, अभिनेत्री के किरदार को या किसी गीत को यादगार बना देने वाले वे कलाकार भी जिनके काम का कहीं कोई चर्चा नहीं होता। ऐसी शख्सियतों के जिंदगी के अनुभवों को जब सुनते हैं और उस दृश्य या गीत को याद करते हैं तो उनके सम्मान में श्रध्दा से अपना सिर बरबस ही झुक जाता है।